अब तक पश्चिम बंगाल की राजनीति में मुख्य मुकाबला ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और भाजपा के बीच था। लेकिन आगामी विधानसभा चुनावों के लिए कांग्रेस ने 284 सीटों पर अपने उम्मीदवारों की घोषणा करके इस मुकाबले को 'त्रिकोणीय' बना दिया है। गठबंधन के बिना चुनाव मैदान में उतरी कांग्रेस के इस कदम ने बंगाल के राजनीतिक समीकरणों को पूरी तरह से बदल दिया है।
अनुभवी नेताओं पर भरोसा: अधीर रंजन की वापसी
कांग्रेस ने इस बार अपने सबसे अनुभवी नेताओं को मैदान में उतारा है। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी लगभग 30 वर्षों बाद विधानसभा चुनाव लड़ेंगे। उन्हें उनके गढ़ बरहमपुर से टिकट दिया गया है। इसके अलावा, कांग्रेस ने ममता बनर्जी और सुवेंदु अधिकारी के खिलाफ भवानीपुर जैसी महत्वपूर्ण सीटों पर प्रदीप प्रसाद को उतारकर मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है। मौसम बेनजीर नूर की घर वापसी के बाद उन्हें मालतीपुर से टिकट दिया गया है।
सामाजिक इंजीनियरिंग और मुस्लिम वोटों पर एक नज़र
इस बार उम्मीदवारों के चयन में कांग्रेस ने एक विशेष रणनीति अपनाई है:
वर्गवार प्रतिनिधित्व: 68 दलित, 64 मुस्लिम, 16 अनुसूचित जनजाति और 42 महिला उम्मीदवार।
लक्षित क्षेत्र: कांग्रेस मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तर दिनाजपुर जैसे मुस्लिम बहुल जिलों में अपनी पुरानी पकड़ को मजबूत करना चाहती है।
किसे नुकसान होगा, किसे फायदा?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर कांग्रेस मजबूती से चुनाव लड़ती है, तो इसका सीधा असर तृणमूल कांग्रेस पर पड़ेगा। मुस्लिम मतदाता परंपरागत रूप से ममता बनर्जी के साथ रहे हैं, लेकिन अगर कांग्रेस इन वोटों में सेंध लगाने में कामयाब होती है, तो भाजपा को इसका सीधा लाभ मिल सकता है। हालांकि, कांग्रेस शहरी क्षेत्रों में युवा और कुशल उम्मीदवारों को मैदान में उतारकर भाजपा के वोटों में कटौती भी कर सकती है।
2021 के शून्य आंकड़े को मिटाने का एक प्रयास
2021 के चुनावों में कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली थी। उस समय टीएमसी को 213 सीटें और भाजपा को 77 सीटें मिली थीं। इस बार कांग्रेस का मुख्य उद्देश्य अपने पुराने गढ़ को फिर से हासिल करना और बंगाल में एक प्रमुख पार्टी के रूप में उभरना है। अगर कांग्रेस मालदा या मुर्शिदाबाद में 2-3 सीटें भी जीत लेती है, तो इसे राज्य की राजनीति में बड़ी सफलता माना जाएगा।






