“चुनाव के समय नेता हाथ जोड़कर आते हैं, लेकिन चुनाव के बाद हमारी टूटी-फूटी सड़कों को देखने कोई नहीं आता।” भरूच जिले के वालिया तालुका के जमनिया गांव के आदिवासी समुदाय का यही आक्रोश है। विकास की चकाचौंध और 'डिजिटल इंडिया' की चर्चाओं के बीच, यह गांव आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहा है। नाराज ग्रामीणों ने अब सीमा पार लड़ाई लड़ने का फैसला किया है और गांव के पुजारी ने एक बोर्ड लगा दिया है जिस पर लिखा है - 'सड़क नहीं तो वोट नहीं'।

बीस साल का इंतजार और खोखले वादे

जमनिया गांव की दुर्दशा कोई नई बात नहीं है। गांव को मुख्य सड़क से जोड़ने वाली 3 किलोमीटर लंबी सड़क को आखिरी बार 2006 में समतल किया गया था। तब से दो दशक बीत चुके हैं, लेकिन इस सड़क का क्या हाल है, इसका कोई ब्यौरा प्रशासनिक फाइलों में नहीं मिला है। आज स्थिति ऐसी है कि यहां रास्ता ढूंढना मुश्किल है, हर तरफ सिर्फ पत्थर और गड्ढे ही गड्ढे हैं। मानसून के दौरान यह गांव एक द्वीप जैसा बन जाता है और लोग बाकी दुनिया से कट जाते हैं।

वह वास्तविकता जो विकास के द्वार खोलती है

गांव में सुविधाओं की कमी न केवल असुविधा है, बल्कि जीवन के लिए खतरा भी है:

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खराब स्वास्थ्य स्थितियां: गांव में जब कोई बीमार पड़ जाता है या किसी गर्भवती महिला को अस्पताल ले जाने की जरूरत होती है, तो 108 नंबर की एम्बुलेंस भी आने से इनकार कर देती है। यहां गड्ढों से भरी सड़कों के कारण कई महिलाओं को सड़क पर ही बच्चे को जन्म देना पड़ता है, ऐसे मामले आम हैं।

शिक्षा के प्रति जुनून: उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए गांव के बच्चों को प्रतिदिन कीचड़ और दलदल से होते हुए 3 किलोमीटर पैदल चलकर मुख्य सड़क तक पहुंचना पड़ता है।

कागजों पर योजनाएं: सरकार की 'नल से जल' और अन्य कल्याणकारी योजनाएं केवल सरकारी रिकॉर्ड में ही हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर, जमनिया गांव अभी भी वंचित है।

'सड़क नहीं तो वोट नहीं' - ग्रामीणों की पुकार

नेताओं के खोखले वादों से तंग आकर पूरे गांव ने सर्वसम्मति से चुनाव का बहिष्कार कर दिया है। ग्रामीणों का कहना है, "हम हर बार लोकतंत्र के नाम पर वोट देते हैं, लेकिन बदले में हमें सिर्फ धूल और गड्ढे ही मिलते हैं। अगर चुनाव से पहले सड़क का काम शुरू नहीं हुआ, तो गांव का एक भी व्यक्ति वोट डालने नहीं जाएगा।"

प्रणाली के लिए चुनौती

जनजातीय क्षेत्र के जमनिया गांव का यह विरोध प्रदर्शन सरकार और प्रशासन के लिए एक चेतावनी है। एक ओर सरकार अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुंचाने का दावा करती है, वहीं दूसरी ओर भरूच का यह गांव प्रशासन की निष्क्रियता का गवाह है। अब देखना यह है कि लोकतंत्र के इस उत्सव में जमनिया गांव के लोगों की समस्याओं का समाधान होगा या उनके मतदान केंद्र खामोश रहेंगे?

जमनिया गांव की मुख्य मांगें:

गांव को मुख्य सड़क से जोड़ने वाली 3 किलोमीटर लंबी पक्की सड़क

आपातकालीन स्थिति में एम्बुलेंस के पहुंचने की सुविधा

पेयजल और शिक्षा जैसी बुनियादी जरूरतों को पूरा करना