नवरात्रि संस्कृति, समर्पण, आनंद और परमेश्वर की आराधना का त्योहार है। नौ रातों तक चलने वाला गरबान उत्सव, जो गुजरात समेत पूरे विश्व में मनाया जाता है, महज एक त्योहार या मनोरंजन नहीं, बल्कि सदियों पुरानी आस्था और संस्कृति का त्रिविध संगम है। यह व्यक्तिगत चेतना का जुड़ाव है। देश के विभिन्न हिस्सों में नवरात्रि अलग-अलग धार्मिक परंपराओं के साथ मनाई जाती है। लेकिन गुजरात में मनाई जाने वाली नवरात्रि की विश्व स्तर पर एक अलग पहचान है।

'गर्भदीप' से शक्ति-उपासना तक: गरबा का आध्यात्मिक रहस्य
नवरात्रि को विश्व का सबसे लंबा लोक नृत्य उत्सव माना जाता है। इसके पीछे एक गहरा आध्यात्मिक और सामाजिक रहस्य छिपा है। 'गरबा' शब्द संस्कृत शब्द 'गर्भदीप' से लिया गया है। छिद्रित मटके में जलाया गया दीपक मानव शरीर और उसमें स्पंदित होने वाली चेतना के रूप में आत्मा का प्रतीक है। जिस प्रकार लौ का प्रकाश छिद्रित मटके से बाहर की ओर फैलता है, उसी प्रकार आंतरिक चेतना मानव शरीर से प्रकट होती है। नवरात्रि के दौरान, जगदंबा की मूर्ति या गरबी को केंद्र में स्थापित किया जाता है और उसके चारों ओर वृत्ताकार रूप से घुमाया जाता है, जिसे ब्रह्मांड के शाश्वत चक्र और जन्म-मृत्यु के चक्र का प्रतीक माना जाता है। यह दर्शाता है कि संपूर्ण विश्व व्यवस्था सर्वोच्च शक्ति के केंद्र बिंदु के चारों ओर घूमती है।

देशभर में नवरात्रि और गुजरात की अनूठी पहचान
नवरात्रि पूरे भारत में श्रद्धापूर्वक मनाई जाती है। पश्चिम बंगाल में भव्य दुर्गा पूजा, उत्तर भारत में रामलीला, दक्षिण भारत में बोम्मई कोलु और मैसूर में दशहरा उत्सव बड़े धूमधाम से मनाए जाते हैं। लेकिन गुजरात में, यह पूजा एक अनोखे सामूहिक लोक रूप में प्रकट होती है। गुजरात में, भक्ति और नृत्य एक हो जाते हैं। गलियों और संकरी सड़कों पर होने वाले पारंपरिक प्राचीन गरबा से लेकर विशाल मैदानों और क्लबों तक, ढोल की थाप और प्राचीन गरबियों की धुन पर, पूरा शहर नौ रातों तक माताजी की भक्ति में लीन रहता है।

गुजराती लोग गरबा के शौकीन होते हैं।
कहा जाता है कि गरबा गुजरातियों के खून और संस्कृति में रचा-बसा है। गुजरात और गरबा का रिश्ता सदियों पुराना है। भगवान कृष्ण की रासलीला और सौराष्ट्र की गोप संस्कृति के रस से शुरू हुआ यह सफर मध्यकालीन भक्त कवियों नरसिंह मेहता, भालन और विशेष रूप से 18वीं शताब्दी के वल्लभ मेवाड़ा की शक्ति-गरबाओं के माध्यम से लोगों के मन में गहराई तक उतर गया। गुजराती समाज, जो आम दिनों में व्यापार और वाणिज्य में व्यस्त रहता है, नवरात्रि आते ही सारी चिंताएं भुलाकर माताजी की पूजा में लीन हो जाता है। दुनिया के किसी भी कोने में रहने वाले गुजराती नवरात्रि आते ही उठकर गरबा की धुन पर नाचने लगते हैं। ऊँच-नीच का भेद भुलाकर, बच्चे से लेकर बड़े तक सभी पारंपरिक चनिया-चोली और केड़ी पहनकर एक ही लय में शामिल हो जाते हैं। नवरात्रि सिर्फ गरबा खेलने का त्योहार नहीं है, बल्कि यह गुजरातियों के जीवंत स्वभाव, उत्साह, आतिथ्य सत्कार और सामाजिक एकता का भी प्रतीक है।

गरबा की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सामाजिक समानता है। अहंकार का त्याग और माँ शक्ति के प्रति पूर्ण समर्पण। मोहल्ले की गलियों से लेकर विशाल मैदानों तक, गाँवों की गलियों से लेकर विदेशों तक, यह त्योहार देशी ढोल की थाप पर मनाया जाता है। यह शक्ति की आराधना का त्योहार है। नवरात्रि के दौरान संचारित होने वाली ऊर्जा गुजरातियों की जीवंतता, आतिथ्य सत्कार और सामूहिक एकता का प्रतीक है। इसी अनूठी सांस्कृतिक विरासत के कारण यूनेस्को ने गुजरात के गरबा को विश्व धरोहर के रूप में सम्मानित किया है। यूनेस्को ने इसे 'अमूर्त सांस्कृतिक विरासत' घोषित करके वैश्विक सम्मान प्रदान किया है। इस प्रकार, गरबा नवरात्रि के नौ दिनों के दौरान पृथ्वी पर अवतरित होने वाला एक दिव्य आनंदमय त्योहार है।

